Thursday, 10 February 2022

कलाकृति का सिद्धांत-20.

                                                           

सृजनात्मक सोच क्या है?

              एक कलाकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण यदि कुछ है तो वह है ‘सोच’। सृजनात्मक सोच पर ही उसकी कला निर्भर करती है। कुछ कलाकारों में सृजनात्मक सोच की प्रतिभा पहले से होती है और कुछ में नहीं। इसे भी कला की तरह अभ्यास के द्वारा सीखा जा सकता है। कला के लिए हम सब बहुत अभ्यास करते हैं, उसके एक-एक तकनीकों को सीखते हैं। लेकिन रचनात्मक सोच के सम्बन्ध में  कभी सोचा ही नहीं, या स्कूलों में बतलाई भी नहीं जाती, कि रचनात्मक सोच कैसे आती है या कैसे पैदा की जाती है?

     यदि हम सोच की बारीकियों को देखें, तो पता चलता है कि सोच एक ऐसी प्रणाली है जो आदमी की उपस्थिति का प्रमाण है। यदि इस प्रणाली को बंद कर दिया जाए या सोच की तरंगों को रोक दिया जाए तो आदमी का अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। सोच इतना सहज होता है कि इससे और सहज दुनिया में कुछ हो भी नहीं सकता। इसलिए इस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योंकि जो जितना सहज होता है उसके अन्दर उतनी ही महत्वपूर्ण जानकारी छिपी रहती है। आवश्यकता है उस छिपी हुई जानकारी को खोजना। एक बात और जान लीजिए- सोच का ही दूसरा रूप ख़ोज है। दोनों का एक ही स्वभाव है ख़ोज करना। सोच कभी अकेला नहीं रहता।  वह हमेशा दो के साथ रहता है और इन्हीं दो में से किसी एक को खोजना है, जो इतना आसान नहीं। जरा सोचिये- सोच की जो प्रवृति है ख़ोज करना, जाँच-परख करना, दो में से एक को खोजना, क्या हम कर पाते हैं? या अपनी पसंद को सोच में देखते हैं? हम अपने स्वाभाव, अपनी पसंद के अनुरूप ही सोच में खोजने लगते हैं। बस यहीं पर चूक हो जाती है, हम रास्ता भटक जाते हैं। सोचते समय यह भूल जाते हैं कि हमारे अन्दर भी एक व्यक्ति बैठा हुआ है, वह भी कुछ बोलता है। क्या आप जानते हैं? आदमी के शरीर का निर्माण दो व्यक्तियों के सिद्धान्त पर हुआ है? इसी सिद्धान्त के आधार पर सोच की दो व्यवस्था होती है, इस दो व्यवस्था के कारण ही हम दो प्रकार से सोचते हैं  दो प्रकार से सोचने का अर्थ है मन में एक साथ दो सोच का आना। दो व्यक्ति का सिद्धान्त और दो व्यवस्था क्या है ? इसे विस्तार से समझना होगा, तभी हम सृजनात्मक सोच को समझ पायेंगे। 

         ध्यान दीजिएगा-  जैसे ही हम सोचना प्रारम्भ करते हैं ठीक उसी क्षण हमारे अन्दर एक व्यक्ति का जन्म होता है। न आगे-न पीछे ठीक सोच के समय। जैसे ही सोच खत्म होती है वह व्यक्ति भी खत्म हो जाता है। कुछ पता नहीं चलता कहाँ गया? यह कोई नई बात नहीं, आप भी अनुभव करते होगे लेकिन ध्यान नहीं देते। सोच के समय ही इस व्यक्ति का जन्म क्यों होता है? बात तो कुछ जरुर है? कोई तो कारण होगा ही? इसी कारण को ख़ोजना है। अन्दर का व्यक्ति अर्थात अन्दर की सोच, बाहर का व्यक्ति अर्थात बाहर की सोच। अन्दर की सोच और बाहर की सोच, अन्दर का व्यक्ति और बाहर का व्यक्ति। यही दो सिद्धान्त हैं, यही दो व्यवस्था है, जिसका सही विश्लेषण सृजनात्मक सोच को उत्पन्न करता है।

                 हमारे अन्दर सोच की दो व्यवस्था काम करती है। एक अन्दर की व्यवस्था, दूसरा बाहर की। पहली व्यवस्था में हमारे अन्दर जो व्यक्ति बैठा हुआ है, उसका बस एक ही काम होता है, अन्दर होने वाली सोच को नियंत्रण में रख कर निर्णय लेना। यह सन्यासी प्रवृति का व्यक्ति ध्यान की अवस्था में रहता है, और जब सोच पैदा होती है ठीक उसी समय आता है। इसे हम देख नहीं सकते लेकिन सोच के समय अनुभव कर सकते हैं कि कोई है, इसे आप ने भी अनुभव किया होगा। स्त्री स्वभाव होने के कारण यह शांत रहता है। इसके पास अपनी कोई पसंद या द्वेष नहीं होती, इसका पूरा दिमाग खाली रहता है, ताकि नई सोच में कोई मिलावट न हो। बाहार की व्यवस्था में जो व्यक्ति रहता है, वह बाहर होने वाली सारी गतिविधियों याने हम जो देखते हैं, करते हैं, उसकी सूचना अन्दर भेजने का काम करता है, ताकि अन्दर का व्यक्ति निर्णय ले सके। बाहर का व्यक्ति अर्थात ‘मैं’, पुरुष स्वभाव और उग्र होने के कारण यह सूचना तो भेजता है लेकिन हस्तक्षेप करता है। अन्दर के व्यक्ति से तर्क प्रारंभ कर अपनी पसंद को सोच के साथ जोड़ देता है। ऐसी स्थिति में सोच अपनी वास्तविकता खो कर कामचलाऊ सोच बन जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि कलाकार को पता नहीं चलता कि सोच में मिलावट है। क्योंकि वह मानता है ध्यान में जो भी सोचा जा रहा है वह सृजन है। लेकिन ऐसा नहीं होता। हम जो भी खाना खा रहे हैं, वह हमारे शरीर के लिए फायदेमंद हो यह जरूरी तो नहीं? सृजन के लिए सृजन की बारीकियों, उसके रह्श्य को जाने बिना सृजन नहीं हो सकता।

                           कोई भी कलाकार सृजन के समय ध्यान की अवस्था में क्यों रहता है ? इसका भी एक कारण है।  ध्यान की अवस्था में कलाकार सोचता नहीं है, वह तो सोच में ख़ोज करता है। सोच में ख़ोज करना और सोचने में बहुत फर्क होता है। सोच में ख़ोज करना सृजन की ओर जाने का रास्ता है और केवल सोचना अपनी इच्छा, अपनी पसंद की पूर्ति करना है। इसलिए कलाकार सोचता नहीं, वह तो सोच में ख़ोज करता है। यहाँ पर ख़ोज का अर्थ ढूँढना नहीं है, अनुसंधान है। कलाकार एक सोच से कई सोचों को पैदा कर उन सभी सोचों पर अनुसंधान करता है। आर्किमिडीज ने भी यही किया था। उसके पास एक सोच थी, ‘पानी में शरीर हल्का हो गया’। इस एक सोच से उसने कई सोचों को पैदा कर सोच की वास्तविकता तक पहुँच गया। Georges  Seurat ने भी रंगों के एक ब्रश स्ट्रोक पर सोचा, कई बार सोचा, इस एक सोच से कई सोचों को पैदा कर Pointillism तक पहुँच गया।

                   एक सोच से कई सोचों को पैदा करना ही सोच की ख़ोज है, सोच का विस्तार है और सृजन का रास्ता भी। इसी रास्ते से हम मूर्त से अमूर्त की ओर जाते हैं। लेकिन इसके लिए स्वयम को अन्दर के व्यक्ति से जोड़ना होगा जो सृजन का श्रोत है। लेकिन जब तक दोनों की दिशा और दशा एक नहीं हो जाती आपस में संपर्क नहीं जुटता। अवस्था  और रास्ते एक होने पर ही संपर्क जुटते हैं। ऐसी अवस्था में अन्दर का व्यक्ति बोलता है, हम सुनते हैं। वह कहता है, हम करते हैं, फिर एक-एक कर सोच का रहस्य खुलने लगता है। क्योंकि वहाँ तीसरा नहीं होता।    

    आजितानंद

                                            



Saturday, 17 October 2020

मूर्त और अमूर्त का सत्य

 मूर्त-अमूर्त और अध्यात्म का समीकरण

                       विजय सिंह - BHU वाले

मूर्त और अमूर्त नदी के दो किनारे हैं। जिस में पानी नहीं होता और न ही कोई जमीन होती है। यहाँ शून्य होता है। और इस शून्य का अपना वेग, अपनी रफ्तार होती है, जो मूर्त को अमूर्त तक पहुँचा सके। मूर्त को छोड़ कर ऐसा कोई भी रास्ता नहीं बना जिसके द्वारा अमूर्त तक पहुँचा जा सके। एक ही रास्ता है, एक ही विकल्प है दूसरा कोई नहीं। इसलिए मूर्त की सीढ़ी पर हमें चढ़ना होगा। चाहे वह ध्यान हो,सोच हो, भाव हो या रेखा हो। इन सबों में मूर्त किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है, चाहे उसकी मात्रा कुछ भी हो। जब मूर्त की यात्रा प्रारंभ होती है तो न जाने कितनी बार मूर्त अपना स्वरूप बदलते, अमूर्त में प्रवेश करते हुए शून्य हो जाता है। जिसे हम देख नहीं सकते। लेकिन कलाकार एक ऐसा प्राणी है जो देखता है। अमूर्त के हर पड़ाव को कलाकार स्वयम देखता है और दिखलाता भी है। ऐसे ही एक कलाकार बनारस की गलियों में, वहाँ के घाट और सड़कों पर एक जमाने से घूम रहा है, खोज रहा है, अमूर्त का वह पड़ाव , अमूर्त का वह स्वरूप जो बनारस की आत्मा है।

              ये कलाकार हैं श्री विजय सिंह। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, BHU वाले। फाइन आर्ट्स फैकल्टी में एक छोटा सा कमरा, एक टेबल, एक कुर्सी और साथ में रंगों का ढेर, ब्रशों का जमावड़ा और सामने छोटे-बड़े कागज-कैनवास का फैलाव, जहाँ से बनारस की आत्मा अमूर्त चित्रण के रूप में बाहर निकलती है। ताकि हम देख सकें बनारस की एक ऐसी छबि जिसमें मूर्त-अमूर्त और अध्यात्म (आस्था) तीनों का समावेश हो। विजय सिंह की कला यात्रा यही से प्रारम्भ होती है, जिसमें हम देखते हैं बनारस का वह अमूर्त रूप जिसे किसी ने चित्रित नहीं किया।

Wassliy Kandinsky/ composition-V

यूरोपियन चित्रकारों द्वारा बनाये गए चित्रों में, मूर्त से अमूर्त के बहुत सारे उदाहरण हैं। पॉल सेजां ने माउन्ट सेंट विक्टर के अनगिनत चित्र बनाये। इन चित्रों में पहली बार अमूर्त और क्यूबिज़्म के तत्व दिखलाई पड़ते हैं। कहा जाय तो पॉल सेजां ही अमूर्त और क्यूबिज़्म के पितामह थे। Wassily kandinsky के द्वारा 1911 में बनाई गई जलरंग पेंटिंग Composition-v को दुनियां की पहली अमूर्त कलाकृति मानी जाती है। इसके पहले भी 1906, स्वीडिश कलाकार Hilma af Klint के चित्र Spiritual Forces में अमूर्त के प्रारंभिक तत्व मिलते हैं।

Hilma af Klint/ Spiritual Forces.

                            लेकिन विजय सिंह ने मूर्त-अमूर्त के साथ अध्यात्म तीनों को एक साथ दर्शाया है। तीनों को हम देख सकते हैं, उन्हें अलग कर सकते हैं। अध्यात्म और आस्था दोनों एक दूसरों से जुड़े हैं। एक के बाद दूसरा आता है, पहले आस्था फिर अध्यात्म। आस्था में प्रकाश का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रकाश और रंग ही आस्था के भाव को उत्पन्न करते हैं, जो अध्यात्म की ओर जाता है, और यही विजय सिंह के चित्रों में तरंग के रूप में वर्णित है। इनके अधिकांश चित्र Vertical - खड़ी अवस्था में बने हैं। जिस पर दृष्टि निचे से ऊपर की ओर जाती है, अर्थात उर्ध्वगामी है। इनके चित्रों में गाढ़ा रंगों का प्रयोग कर रंगों के घनत्व को बढ़ाया गया है, ताकि प्रकाश के सूक्ष्म रूप को दिखलाया जा सके। कुछ चित्रों को छोड़ कर इनके अधिकांश चित्रों में रुचि का केन्द्र विंदु सतह पर है, धरातल पर है जो एक अदृश्य त्रिकोण की रचना करती है। यदि हम काल्पनिक त्रिकोण को देखें तो इनकी तीनों भुजाएं ऊपर की ओर एक विंदु पर मिलती है, जो अध्यात्म की ऊँचाई है, अमूर्त की ऊँचाई है और यही से ब्रह्माण्ड की यात्रा प्रारम्भ होती है, जिसे हम अनुभव कर सकते हैं, देख नहीं सकते। विजय सिंह की कलाकृति में त्रिकोण का यही रहस्य है।

इस त्रिकोण का अच्छा उदाहरण इनकी पेंटिंग "चिता भूमि (Funeral Land)" में देख सकते हैं। यहाँ पर पिकटोरिअल स्पेस (पेंटिंग) का केन्द्र विंदु - रुचि का केंद्र सतह पर नीचे की ओर है और यही पर अदृश्य त्रिकोण की रचना होती है, जो हमारी दृष्टि को ऊपर की ओर ले जाती है। इस चित्र में विषयवस्तु "चिता" है जिससे निकलती हुई ज्वाला उर्ध्वगामी है। इस चित्र में पिकटोरिअल स्पेस को सक्रिय बनाने के लिए तीन तरफ से गाढ़े (काला) रंग का प्रयोग किया गया है ताकि हमारी आँखे विषयवस्तु के आस-पास घूमती रहे।

                     यदि देखा जाय तो विजय सिंह की पेंटिंग में तीनों रूप  (मूर्त-अमूर्त, अध्यात्म), और तीनों की उपस्थिति का संगम है, जो बनारस की आत्मा है।

अजितानन्द

Sunday, 11 October 2020

कलाकृति को देखने की कला

कलाकृति को देखने की कला 
                 Philosophy of Artworks
भाग--4

रूप / शैली (Style)
रूप कहने से हम अक्सर शक्ल, सूरत या चेहरा ही समझ लेते हैं लेकिन रूप वह नहीं जो हम समझते हैं। रूप तो प्रकृति है, स्वभाव है, लक्षण है। खाली जगह भी रूप है। खाली कुछ होता नहीं, यह तो हमारी धरना है कि खाली है परन्तु ऐसा कुछ नहीं। खाली जगह के भी अपने स्वभाव और लक्षण होते हैं। कहा जाय तो कलाकृति की पूरी की पूरी पृष्टभूमि ही रूप है। यह पृष्टभूमि कई छोटे रूपो में विभाजित रहती है, जो एक साथ मिल कर दिव्य रूप का निर्माण करती है, जिसे हम कलाकृति कहते हैं। रूप का विस्तार गठन के आधार पर ही होता है तथा इन दोनों के सहयोग और सामंजस्य के द्वारा शैली (Style) बनती है। हम अपनी क्षमता और तकनीक की बुनियाद पर एक रास्ता खोजते हैं, जिसके द्वारा अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त कर सकें, यही रास्ता शैली है, जो कलाकार की पहचान बनती है। यह पूर्ण रूप से कलाकार की सोच और विचारों का मिला-जुला स्वरूप है। ऐसा नहीं होता कि आज इस शैली में तो कभी उस शैली में अपने आप को बदलते रहें। हमारा रहन-सहन, खान-पान तो कभी बदलता नहीं फिर अचानक शैली कैसे बदल जायेगी ? चाल-ढाल कैसे बदल जायेगें? इस प्रकार तो हम अपना व्यक्तित्व, अपनी पहचान ही खो बैठेगें।
                       एक व्यक्ति गाँव का मुखिया बना। मुखिया बनने के बाद उसने सोचा अब तो मैं मुखिया बन गया हूँ अतः मुखिया की तरह रहना चाहिए, कुछ नए तरीके से, एक दम अलग। दूसरे दिन वह गाँव में घूमने निकला। चेहरा सीधा, सीना ताने अकड़ कर चल रहा था। देखने वालों ने सोचा मुखिया को कुछ हो गया है। वे मुखिया के पास गए  तो मुखिया गोल-गोल आँखे निकाल बात करने लगा। गाँव वालों को लगा यह कल तक तो ठीक था, आज अचानक क्या हो गया। कहीं मुखिया बनने के बाद सर तो नहीं घूम गया? धीरे-धीरे बात पूरे गाँव में फैल गई कि मुखिया पागल हो गया है। उसके घरवाले आ गए, पूरा गाँव इकट्ठा हो गया मुखिया को देखने के लिए। लोगों ने कहा जल्दी पागलखाने भेजो नहीं तो दुर्घटना कर बैठेगा। कुछ लोग पकड़ने के लिए आगे बढ़े। यह देख मुखिया- मैं पागल नहीं हूँ बोलता हुआ भागने लगा। इसपर गाँव वालों को पक्का भरोसा हो गया कि मुखिया पागल हो गया है। मुखिया गिड़गिड़ाता रहा  लेकिन अब क्या फायदा? अचानक शैली बदलने पर लोग पागल ही समझेगें। शैली कभी बदलती नहीं, शैली में बदलाव आते हैं, परिवर्तन होते हैं, फेरबदल होती है लेकिन शैली नहीं बदलती। यह तो स्वभाव है।
                              शैली से देश और काल की पहचान होती है। हम दूसरी शैली से प्रभावित हो सकते हैं। उसके मूल तत्व, Access की झलक हमारी शैली में मिल सकते हैं। फिर भी हमारी शैली की मौलिकता बनी रहती है। ऐसा नहीं होता कि प्रभाव में आकर अपनी पहचान खो दें। दर-असल हम अपने आस-पास देखना छोड़ दिये , सोच और खोज की प्रवृत्ति कम होने लगी और बाहर की शैली को आधुनिक कला का प्रमाण मान कर अभिव्यक्ति करने लगे। इस प्रकार हम बाहर की शैली में अभिव्यक्ति करने वाले टेक्नीशियन बन गए। हमारी मौलिकता कहाँ गई ? क्या इसी को कलाकार कहते हैं?
                                एक बार अपने मित्र के घर गया जो ख्याति प्राप्त चित्रकार थे। उन्होंने आधे घंटे तक अपनी पेंटिंग दिखाई। अंत में एक पेंटिंग को देख मैंने कहा इसे पिछ्ली बार देखा है। इतना कहते ही वे बोल पड़े, कैसे देख लिया? यह पेंटिंग तो कल ही बनाई है। अब मैं असमंजस में। लेकिन मुझे कैसे पता चले यह कब की बनी हुई है? पेंटिंग में केवल रंगों का पैच, उसके उतार-चढ़ाव, भाव भी लगभग एक। एक पेंटिंग देखें या दस, कोई फर्क नहीं, कोई भी धोखा खा सकता है। यह कलाकार की गलती नहीं शैली की है, उधार की शैली। दूसरों की शैली में अभिव्यक्ति करने पर यही होता है। दूसरों के घर में उपर जाने का रास्ता पता नहीं होता तो भटकाव होगा ही। दूसरों की शैली, दूसरों का घर दोनों में दुबिधा, दोनों में भटकाव। 
                           यदि देखा जाय तो शैली एक बहुत बड़ी उलझन है और जहाँ उलझन होती है वहीं खोज होती है। जब हम भटक जाते हैं तभी खोज करते हैं। आजतक दुनिया में जितनी भी खोजें हुई हैं और होगी, उनके अपने सिद्धान्त होते हैं, अपनी रूपरेखा होती है। जिसके द्वारा सबसे अलग, सबसे भिन्न, जिसे कभी देखा नहीं गया, कभी सुना नहीं गया उसे प्रस्तुत करते हैं, और यही खोज होती है। क्या हमारा कोई दिशानिर्देश है? क्या कोई घोषणापत्र है? या हमने कभी खोज की है? या इधर-उधर से उठा कर रख दिया, उलट-फेर कर जोड़ दिया और खोज हो गई? जो खोजता है वहीं जिंदा रहता है, वहीं कुछ दे पाता है। बाकी सब तो अपने तकनीक का प्रदर्शन करते हैं, नुमाइश करते हैं, जो सदियों से होता आ रहा है और होता रहेगा। शैली की खोज एक अलग विज्ञान है, अनुभूति का विज्ञापन, आत्म चिंतन का विज्ञान।
शैली के दो प्रकार हैं----अनुगामी और उर्ध्वगामी 
अनुगामी------- अनुगामी का अर्थ है अनुसरण। हम अनुसरण करते हैं एक बनी-बनाई पद्धति या शैली का। इसमें हमारी सोच नहीं होती, हम इसमें कोई परिवर्तन नहीं करते, न ही कोई बदलाव करते हैं। जैसा है वैसा ही अनुसरण करते हैं। यही अनुसरण परम्परा बन जाती है। एक चलता हुआ सिलसिला, एक के पीछे एक ऐसा क्रम जो वंश परम्परा, शिष्य परम्परा के रूप में स्थापित होता है। जितने भी लोककला या पारम्परिक कला हैं उनमें परिवर्तन नहीं अनुसरण होता है। यहीं अनुगामी कला है।
उर्ध्वगामी--------विकास की ओर चलने वाला, जिसमें खोज और परिवर्तन की सोच बनी रहे। यही एक ऐसी निरन्तर धारा है जो ऊपर की ओर चलती हुई नए स्वरूप में अंकुरित होती है। आधुनिक कला इसी धारा की एक कड़ी है।

अजितानंद