सृजनात्मक सोच क्या है?
एक कलाकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण यदि कुछ है तो वह है ‘सोच’। सृजनात्मक सोच पर ही उसकी कला निर्भर करती है। कुछ कलाकारों में सृजनात्मक सोच की प्रतिभा पहले से होती है और कुछ में नहीं। इसे भी कला की तरह अभ्यास के द्वारा सीखा जा सकता है। कला के लिए हम सब बहुत अभ्यास करते हैं, उसके एक-एक तकनीकों को सीखते हैं। लेकिन रचनात्मक सोच के सम्बन्ध में कभी सोचा ही नहीं, या स्कूलों में बतलाई भी नहीं जाती, कि रचनात्मक सोच कैसे आती है या कैसे पैदा की जाती है?
यदि हम सोच की बारीकियों को देखें, तो पता चलता है कि सोच एक ऐसी प्रणाली है जो आदमी की उपस्थिति का प्रमाण है। यदि इस प्रणाली को बंद कर दिया जाए या सोच की तरंगों को रोक दिया जाए तो आदमी का अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। सोच इतना सहज होता है कि इससे और सहज दुनिया में कुछ हो भी नहीं सकता। इसलिए इस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योंकि जो जितना सहज होता है उसके अन्दर उतनी ही महत्वपूर्ण जानकारी छिपी रहती है। आवश्यकता है उस छिपी हुई जानकारी को खोजना। एक बात और जान लीजिए- सोच का ही दूसरा रूप ख़ोज है। दोनों का एक ही स्वभाव है ख़ोज करना। सोच कभी अकेला नहीं रहता। वह हमेशा दो के साथ रहता है और इन्हीं दो में से किसी एक को खोजना है, जो इतना आसान नहीं। जरा सोचिये- सोच की जो प्रवृति है ख़ोज करना, जाँच-परख करना, दो में से एक को खोजना, क्या हम कर पाते हैं? या अपनी पसंद को सोच में देखते हैं? हम अपने स्वाभाव, अपनी पसंद के अनुरूप ही सोच में खोजने लगते हैं। बस यहीं पर चूक हो जाती है, हम रास्ता भटक जाते हैं। सोचते समय यह भूल जाते हैं कि हमारे अन्दर भी एक व्यक्ति बैठा हुआ है, वह भी कुछ बोलता है। क्या आप जानते हैं? आदमी के शरीर का निर्माण दो व्यक्तियों के सिद्धान्त पर हुआ है? इसी सिद्धान्त के आधार पर सोच की दो व्यवस्था होती है, इस दो व्यवस्था के कारण ही हम दो प्रकार से सोचते हैं दो प्रकार से सोचने का अर्थ है मन में एक साथ दो सोच का आना। दो व्यक्ति का सिद्धान्त और दो व्यवस्था क्या है ? इसे विस्तार से समझना होगा, तभी हम सृजनात्मक सोच को समझ पायेंगे।
ध्यान दीजिएगा- जैसे ही हम सोचना प्रारम्भ करते हैं ठीक उसी क्षण हमारे अन्दर एक व्यक्ति का जन्म होता है। न आगे-न पीछे ठीक सोच के समय। जैसे ही सोच खत्म होती है वह व्यक्ति भी खत्म हो जाता है। कुछ पता नहीं चलता कहाँ गया? यह कोई नई बात नहीं, आप भी अनुभव करते होगे लेकिन ध्यान नहीं देते। सोच के समय ही इस व्यक्ति का जन्म क्यों होता है? बात तो कुछ जरुर है? कोई तो कारण होगा ही? इसी कारण को ख़ोजना है। अन्दर का व्यक्ति अर्थात अन्दर की सोच, बाहर का व्यक्ति अर्थात बाहर की सोच। अन्दर की सोच और बाहर की सोच, अन्दर का व्यक्ति और बाहर का व्यक्ति। यही दो सिद्धान्त हैं, यही दो व्यवस्था है, जिसका सही विश्लेषण सृजनात्मक सोच को उत्पन्न करता है।
हमारे अन्दर सोच की दो व्यवस्था काम करती है। एक अन्दर की व्यवस्था, दूसरा बाहर की। पहली व्यवस्था में हमारे अन्दर जो व्यक्ति बैठा हुआ है, उसका बस एक ही काम होता है, अन्दर होने वाली सोच को नियंत्रण में रख कर निर्णय लेना। यह सन्यासी प्रवृति का व्यक्ति ध्यान की अवस्था में रहता है, और जब सोच पैदा होती है ठीक उसी समय आता है। इसे हम देख नहीं सकते लेकिन सोच के समय अनुभव कर सकते हैं कि कोई है, इसे आप ने भी अनुभव किया होगा। स्त्री स्वभाव होने के कारण यह शांत रहता है। इसके पास अपनी कोई पसंद या द्वेष नहीं होती, इसका पूरा दिमाग खाली रहता है, ताकि नई सोच में कोई मिलावट न हो। बाहार की व्यवस्था में जो व्यक्ति रहता है, वह बाहर होने वाली सारी गतिविधियों याने हम जो देखते हैं, करते हैं, उसकी सूचना अन्दर भेजने का काम करता है, ताकि अन्दर का व्यक्ति निर्णय ले सके। बाहर का व्यक्ति अर्थात ‘मैं’, पुरुष स्वभाव और उग्र होने के कारण यह सूचना तो भेजता है लेकिन हस्तक्षेप करता है। अन्दर के व्यक्ति से तर्क प्रारंभ कर अपनी पसंद को सोच के साथ जोड़ देता है। ऐसी स्थिति में सोच अपनी वास्तविकता खो कर कामचलाऊ सोच बन जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि कलाकार को पता नहीं चलता कि सोच में मिलावट है। क्योंकि वह मानता है ध्यान में जो भी सोचा जा रहा है वह सृजन है। लेकिन ऐसा नहीं होता। हम जो भी खाना खा रहे हैं, वह हमारे शरीर के लिए फायदेमंद हो यह जरूरी तो नहीं? सृजन के लिए सृजन की बारीकियों, उसके रह्श्य को जाने बिना सृजन नहीं हो सकता।
कोई भी कलाकार सृजन के समय ध्यान की अवस्था में क्यों रहता है ? इसका भी एक कारण है। ध्यान की अवस्था में कलाकार सोचता नहीं है, वह तो सोच में ख़ोज करता है। सोच में ख़ोज करना और सोचने में बहुत फर्क होता है। सोच में ख़ोज करना सृजन की ओर जाने का रास्ता है और केवल सोचना अपनी इच्छा, अपनी पसंद की पूर्ति करना है। इसलिए कलाकार सोचता नहीं, वह तो सोच में ख़ोज करता है। यहाँ पर ख़ोज का अर्थ ढूँढना नहीं है, अनुसंधान है। कलाकार एक सोच से कई सोचों को पैदा कर उन सभी सोचों पर अनुसंधान करता है। आर्किमिडीज ने भी यही किया था। उसके पास एक सोच थी, ‘पानी में शरीर हल्का हो गया’। इस एक सोच से उसने कई सोचों को पैदा कर सोच की वास्तविकता तक पहुँच गया। Georges Seurat ने भी रंगों के एक ब्रश स्ट्रोक पर सोचा, कई बार सोचा, इस एक सोच से कई सोचों को पैदा कर Pointillism तक पहुँच गया।
एक सोच से कई सोचों को पैदा करना ही सोच की ख़ोज है, सोच का विस्तार है और सृजन का रास्ता भी। इसी रास्ते से हम मूर्त से अमूर्त की ओर जाते हैं। लेकिन इसके लिए स्वयम को अन्दर के व्यक्ति से जोड़ना होगा जो सृजन का श्रोत है। लेकिन जब तक दोनों की दिशा और दशा एक नहीं हो जाती आपस में संपर्क नहीं जुटता। अवस्था और रास्ते एक होने पर ही संपर्क जुटते हैं। ऐसी अवस्था में अन्दर का व्यक्ति बोलता है, हम सुनते हैं। वह कहता है, हम करते हैं, फिर एक-एक कर सोच का रहस्य खुलने लगता है। क्योंकि वहाँ तीसरा नहीं होता।
आजितानंद

